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करवा चौथ व्रत कथा
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करवा चौथ व्रत कथा

अखंड सौभाग्य और दांपत्य प्रेम का प्रतीक करवा चौथ व्रत की पावन वीरावती कथा। चंद्रोदय पूजन एवं करवा अर्घ्य का संपूर्ण विधान।

गीत / Lyrics

॥ श्री Goddess Parvati नमः ॥
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी । तुमको निसदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ मांग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को । उज्ज्वल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको ॥
ॐ ॐ ॐ
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संस्कृत पाठ

मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादिसुस्थिरश्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये ।

Transliteration

Mama Sukhasaubhagya Putrapautradisusthirashri Praptaye Karaka Chaturthi Vratamaham Karishye ||

अर्थ

अपने सुख, अखंड सौभाग्य, पुत्र-पौत्र तथा स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति हेतु मैं इस करक चतुर्थी (करवा चौथ) व्रत का पूर्ण निष्ठा से अनुष्ठान करती हूँ।

लाभ

करवा चौथ का व्रत रखने व पावन कथा सुनने से पति को दीर्घायु प्राप्त होती है, दांपत्य जीवन में अनन्य प्रेम एवं सौहार्द बना रहता है तथा घर-परिवार में मंगलकारी वातावरण निर्मित होता है।

कैसे जपें

कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को सूर्योदय से पूर्व सरगी ग्रहण कर निर्जला व्रत का संकल्प लें। सायंकाल माता पार्वती, भगवान शिव, गणेश जी व कार्तिकेय जी का पूजन कर करवा चौथ की कथा सुनें। रात्रि में छलनी से चंद्र दर्शन कर अर्घ्य दें और पति के दर्शन कर व्रत का पारण करें।

विस्तृत सामग्री

करवा चौथ की सबसे प्रचलित पौराणिक कथा पतिव्रता वीरावती की है। प्राचीन काल में एक धर्मात्मा ब्राह्मण के सात पुत्र और एक पुत्री थी, जिसका नाम वीरावती था। सातों भाई अपनी इकलौती बहन से अगाध स्नेह करते थे। विवाह के उपरांत वीरावती अपने मायके आई हुई थी। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को उसने अखंड सौभाग्य के लिए करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा। दिनभर निर्जल रहने के कारण सायंकाल भूख-प्यास से वीरावती अत्यंत व्याकुल और मूर्छित होने लगी। उसके भाइयों से बहन का यह कष्ट देखा नहीं गया। भाइयों ने नगर के बाहर एक ऊंचे वटवृक्ष पर एक दीपक रखकर उसके आगे छलनी लगा दी, जिससे ऐसा आभास हुआ कि चतुर्थी का चंद्रमा उदय हो गया है। भाइयों ने बहन से कहा—"बहना! चंद्रोदय हो गया है, अर्घ्य देकर भोजन कर लो।" वीरावती ने छलनी से दीपक को चंद्रमा समझकर अर्घ्य दे दिया और पहला कौर मुख में डाला। प्रथम कौर में बाल निकला, दूसरे में छींक हुई और तीसरे कौर के समय उसके पति के देहांत का समाचार आ गया। वीरावती फूट-फूट कर रोने लगी। माता इंद्राणी (शची) ने आकर वीरावती को बताया कि उसने बिना चंद्र दर्शन के अर्ध-सत्य से व्रत तोड़ दिया था, जिससे यह अनिष्ट हुआ। माता ने उसे पूरे वर्ष प्रत्येक मास की चतुर्थी का व्रत करने और अगले करवा चौथ पर पूर्ण श्रद्धा से निर्जला व्रत रखने का मार्ग दिखाया। वीरावती ने कठिन नियमों का पालन करते हुए विधि-विधान से शिव-पार्वती और करवा चौथ का व्रत किया। उसकी सच्ची तपस्या और निष्ठा से प्रसन्न होकर माता पार्वती और भगवान शिव ने उसके पति को पुनः जीवनदान दिया और अखंड सौभाग्य का वरदान प्रदान किया।
HINDI Festival Katha Goddess Parvati
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