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समुद्र मंथन पौराणिक कथा
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समुद्र मंथन पौराणिक कथा

देवताओं और दानवों द्वारा क्षीरसागर के मंथन की अमर पौराणिक कथा। चौदह रत्नों, हलाहल विष और अमृत कलश की प्राकट्य गाथा।

गीत / Lyrics

॥ श्री Lord Vishnu नमः ॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की । गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला । श्रवण में कुण्डल झलकाता, पीत पट कटि तड़ित-सा लसता । नील मणिकंठ विराजै, मुकुट सिर छत्र साजै ॥
ॐ ॐ ॐ
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संस्कृत पाठ

क्षीरोदधिमथनप्रसूतं पीयूषपूरं परमामृतं च । नारायणं विश्वपतिं प्रसन्नं नमामि देवेशमनादिमध्यम् ॥

Transliteration

Kshirodadhimathanaprasutam Piyushapuram Paramamritam Cha | Narayanam Vishvapatim Prasannam Namami Deveshamanadimadhyam ||

अर्थ

समुद्र मंथन से अमृत प्रकट करने वाले, विश्व के स्वामी और सर्वकल्याणकारी अनादि-अनंत देवाधिदेव भगवान श्री नारायण को कोटि-कोटि वंदन है।

लाभ

समुद्र मंथन की कथा त्याग, संयम और ईश्वरार्पण का संदेश देती है। इसके श्रवण से जीवन की विषमताएं दूर होकर मानसिक शांति और सद्बुद्धि की प्राप्ति होती है।

कैसे जपें

एकादशी, पूर्णिमा या पर्व के अवसर पर शांत मन से इस पवित्र कथा का वाचन अथवा श्रवण करना चाहिए।

विस्तृत सामग्री

श्रीमद्भागवत एवं विष्णु पुराण के अनुसार, एक बार देवराज इंद्र के अहंकार के कारण महर्षि दुर्वासा ने उन्हें श्रीहीन होने का शाप दे दिया। इसके प्रभाव से स्वर्ग का समस्त ऐश्वर्य, लक्ष्मी और शक्ति क्षीण हो गई और असुरों ने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। व्याकुल होकर सभी देवता भगवान ब्रह्मा जी के साथ भगवान श्री हरि विष्णु की शरण में पहुंचे। भगवान विष्णु ने युक्ति सुझाई—"हे देवगण! इस समय असुरों से संधि कर क्षीरसागर का मंथन करो। समुद्र मंथन से अमृत की प्राप्ति होगी, जिसे पीकर तुम अमर हो जाओगे।" मंथन का विधान: मंदराचल पर्वत को मथानी तथा नागराज वासुकि को नेती बनाया गया। भगवान विष्णु ने कच्छप (कूर्म) अवतार धारण कर मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर संभाला। असुरों ने वासुकि के मुख की ओर और देवताओं ने पूंछ की ओर से मंथन प्रारंभ किया। मंथन से निकले चौदह रत्न: 1. कालकूट (हलाहल) विष — संसार की रक्षा हेतु भगवान शिव ने इसे पी लिया और नीलकंठ कहलाए। 2. कामधेनु गाय — जिसे ऋषियों ने स्वीकार किया। 3. उच्चैःश्रवा घोड़ा — जिसे राजा बलि ने लिया। 4. ऐरावत हाथी — जिसे देवराज इंद्र ने स्वीकार किया। 5. कौस्तुभ मणि — जिसे भगवान विष्णु ने अपने वक्षस्थल पर धारण किया। 6. कल्पवृक्ष — जो देवताओं के नंदनवन में स्थापित हुआ। 7. रंभा अप्सरा — जो देवलोक की शोभा बनीं। 8. माता महालक्ष्मी — जिन्होंने भगवान विष्णु को पति रूप में वरण किया। 9. वारुणी सुरा — जिसे असुरों ने लिया। 10. चंद्रमा — जिसे भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण किया। 11. पारिजात वृक्ष — जो दिव्य पुष्पों से सुशोभित है। 12. पांचजन्य शंख — जो भगवान विष्णु का आयुध बना। 13. भगवान धन्वंतरि — आयुर्वेद के प्रवर्तक, जो हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। 14. अमृत — अंत में भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर असुरों को मोहित किया और देवताओं को अमृत पान कराकर अमर कर दिया।
HINDI Pauranik Katha Lord Vishnu
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