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श्री सत्यनारायण व्रत कथा - चतुर्थ अध्याय
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श्री सत्यनारायण व्रत कथा - चतुर्थ अध्याय

सत्यनारायण कथा चतुर्थ अध्याय - दंडी संन्यासी प्रसंग, नौका संकट एवं प्रसाद का महात्म्य।

गीत / Lyrics

॥ श्री Lord Vishnu नमः ॥
इधर साधु वैश्य के नगर में चोरों ने उसका सारा धन चुरा लिया। उसकी पत्नी लीलावती और पुत्री कलावती अत्यंत दरिद्र होकर भीख मांगने लगीं। एक दिन कलावती ने एक ब्राह्मण के घर सत्यनारायण की कथा देखी और प्रसाद ग्रहण किया। घर आकर उसने माता को बताया। लीलावती ने तुरंत अपनी भूल का पश्चाताप किया और श्रद्धापूर्वक सत्यनारायण का पूजन किया और पति तथा दामाद के सकुशल लौटने की प्रार्थना की। भगवान प्रसन्न हुए और उसी रात राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में आदेश दिया कि उन दोनों वैश्यों को प्रातःकाल छोड़ दो और उनका धन लौटा दो, अन्यथा तुम्हारा राज्य नष्ट हो जाएगा। राजा ने दोनों को मुक्त किया और दुगना धन देकर विदा किया। मार्ग में भगवान ने दंडी संन्यासी का वेश धरकर साधु वैश्य की परीक्षा ली और पूछा— 'तुम्हारी नाव में क्या है?' वैश्य ने अभिमान से झूठ कहा— 'बेल और पत्ते हैं।' भगवान ने कहा— 'तुम्हारा वचन सत्य हो।' नाव हल्की हो गई और धन की जगह पत्ते हो गए। वैश्य मूर्च्छित हो गया। होश आने पर उसने प्रभु के चरण पकड़कर क्षमा याचना की। भगवान ने पुनः नाव को धन से भर दिया। घर के निकट पहुंचकर वैश्य ने दूत भेजा। लीलावती और कलावती कथा सुन रही थीं। पति के आगमन का समाचार सुनकर कलावती प्रसाद खाए बिना ही नदी तट पर दौड़ पड़ी। प्रसाद का अनादर होने से भगवान रुष्ट हो गए और उसकी नाव दामाद सहित जल में डूब गई। कलावती विलाप करने लगी। तब आकाशवाणी हुई कि कन्या प्रसाद छोड़कर आई है, यदि वह प्रसाद ग्रहण करके आए तो पति को पाएगी। कलावती ने घर जाकर प्रसाद खाया और वापस आई, तो नाव और पति दोनों सुरक्षित मिल गए। ॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथायां चतुर्थोध्यायः समाप्तः ॥
ॐ ॐ ॐ
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लाभ

प्रसाद के अनादर से बचने की सीख तथा विपत्ति में भगवान के नाम का अटूट संबल मिलता है।

विस्तृत सामग्री

इधर साधु वैश्य के नगर में चोरों ने उसका सारा धन चुरा लिया। उसकी पत्नी लीलावती और पुत्री कलावती अत्यंत दरिद्र होकर भीख मांगने लगीं। एक दिन कलावती ने एक ब्राह्मण के घर सत्यनारायण की कथा देखी और प्रसाद ग्रहण किया। घर आकर उसने माता को बताया। लीलावती ने तुरंत अपनी भूल का पश्चाताप किया और श्रद्धापूर्वक सत्यनारायण का पूजन किया और पति तथा दामाद के सकुशल लौटने की प्रार्थना की। भगवान प्रसन्न हुए और उसी रात राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में आदेश दिया कि उन दोनों वैश्यों को प्रातःकाल छोड़ दो और उनका धन लौटा दो, अन्यथा तुम्हारा राज्य नष्ट हो जाएगा। राजा ने दोनों को मुक्त किया और दुगना धन देकर विदा किया। मार्ग में भगवान ने दंडी संन्यासी का वेश धरकर साधु वैश्य की परीक्षा ली और पूछा— 'तुम्हारी नाव में क्या है?' वैश्य ने अभिमान से झूठ कहा— 'बेल और पत्ते हैं।' भगवान ने कहा— 'तुम्हारा वचन सत्य हो।' नाव हल्की हो गई और धन की जगह पत्ते हो गए। वैश्य मूर्च्छित हो गया। होश आने पर उसने प्रभु के चरण पकड़कर क्षमा याचना की। भगवान ने पुनः नाव को धन से भर दिया। घर के निकट पहुंचकर वैश्य ने दूत भेजा। लीलावती और कलावती कथा सुन रही थीं। पति के आगमन का समाचार सुनकर कलावती प्रसाद खाए बिना ही नदी तट पर दौड़ पड़ी। प्रसाद का अनादर होने से भगवान रुष्ट हो गए और उसकी नाव दामाद सहित जल में डूब गई। कलावती विलाप करने लगी। तब आकाशवाणी हुई कि कन्या प्रसाद छोड़कर आई है, यदि वह प्रसाद ग्रहण करके आए तो पति को पाएगी। कलावती ने घर जाकर प्रसाद खाया और वापस आई, तो नाव और पति दोनों सुरक्षित मिल गए। ॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथायां चतुर्थोध्यायः समाप्तः ॥
HINDI Satyanarayan Katha Lord Vishnu 16:00
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